
संतनु कुमार कुर्रे की रिपोर्ट 
रीति रिवाज से मां के अंतिम संस्कार की तैयारियां की और दोनों बेटियों ने मां को अंतिम कांधा देते हुए श्मशान तक ले गए, जिसके बाद बड़ी बेटी ने मां को मुखाग्नि दी।
अंतिम संस्कार के दौरान हर व्यक्ति की आंखें नम थीं
मां के निधन के बाद परिवार गहरे शोक में डूबा हुआ था। ऐसे कठिन समय में बेटी ने खुद को संभाला और मां के प्रति अंतिम कर्तव्य निभाने के लिए आगे आई। नम आंखों और भारी मन से उसने मां को मुखाग्नि दी। इस दौरान वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं और माहौल बेहद भावुक हो उठा।
मां ने बेटियों को हमेशा बेटे की तरह पाला था
चौहान परिवार को नजदीक से जानने वाले बताते हैं कि मां ने अपनी दोनों बेटियों को हमेशा बेटे की तरह पाला। उसे हर कदम पर आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया और जीवन में मजबूत बनने की सीख दी। शायद यही संस्कार थे, जिन्होंने इस कठिन घड़ी में बेटी को इतना मजबूत बनाया कि वह मां को विदा करने के लिए खुद आगे खड़ी हो गई। इस घटना ने समाज को एक गहरा संदेश दिया है कि रिश्तों का मूल्य किसी परंपरा से बड़ा होता है। आज उस बेटी ने यह साबित कर दिया कि बेटियां केवल परिवार की शान ही नहीं, बल्कि हर जिम्मेदारी निभाने का साहस और सामर्थ्य भी रखती है।



